ज़िन्दगी की दौड़ में
आगे बढने की होड़ में
क्या कुछ पीछे छोड़ आए हैं
रिश्ते नाते तोड़ आए हैं
जब हम छोटे बच्चे थे
सपने देखा करते थे
अपने पैरों पर दौडेंगे
सारी पाबंदियां तोडेंगे
आज जब वो दिन आया है
ख़ुद को अकेला ही पाया है
चवन्नी में मिलने वाली खुशी
डॉलर से भी न खरीदी जा सकी
हरे पेडों पर पतझड़ है
हमारी झोली भी अध्-भर है
फ़िर भी खुश होने में संकोच है
आज लगता नाकाफी हर कोष है
अपने मन के पास पहुंचे
एक मन सोना हाथों में भींचे
आंखों में आँसू थे और मुख पर अपमान
चंद सिक्कों के लिए क्या हो गया इंसान
आदर से मुझे बिठाया
और पूछा की मैं क्यूँ आया
मेरे पल मुझे लौटा दो
मेरी खुशियाँ मुझे लौटा दो
विनती की हाथ जोड़कर
मन को मन-भर सोना अर्पण कर
अन्दर ही अन्दर सिमट गया मैं
मन पसीज कर रह गया मैं
मन की गोद में सुंदर पंछी
सोने पर आ कर जो बैठी
उड़ गई मैले कुसुम बिखराके
मुझको बस यही सिखाके
समय अटल है,
धन बस छल है
जो खुशी बेची धनार्जन में
सो क़र्ज़ चुकाना है जीवन में
ज़िन्दगी की दौड़ में
आगे बढने की होड़ में
जो खुशी बेची धनार्जन में
सो क़र्ज़ चुकाना है जीवन में
3 comments:
Shabash mere sher !!
hindi kitni sahi kerta jaa raha hai !!
चवन्नी में मिलने वाली खुशी
डॉलर से भी न खरीदी जा सकी mast hai ,
pact ban lete hain juldi ----
jha gaurav ke dohe ke naam se
Mr Saxena i think u should come back soon
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